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👉 प्रश्न क्या देवता साधक की साधना आगे बढ़ने पर समय-समय पर बाधा उत्पन्न करते हैं???
👉साधक भाइयों बहनो ! आज जिस विशेष प्रश्न को श्री सोनी जी ने उठाया है , उसे गंभीरता से समझ लीजिए --
देवता अच्छे होते हैं या बुरे ?देवता प्रकृति के नियम के अनुसार चलने वाले होते हैं या विपरीत? देवता अच्छे कर्म करने वालों को अच्छा फल देते हैं या बुरा!? देवता सत्य न्याय एवं धर्म का साथ देते हैं या अधर्म का !? यदि देवता परमात्मा के मार्ग पर चलने वालों को भटकाने का कार्य करते हैं तो फिर राक्षसों का कार्य क्या है?? आखिरकार देवताओं को एक सच्चे साधक से दुश्मनी क्या है?? यही की साधना करते हुए साधक इंद्र की कुर्सी को छीन लेगा !!?अगर इतनी प्रतिद्वंद्विता देवताओं के मस्तिष्क में चलती है तो ये देवता क्या वर्तमान राजनीतिज्ञों से कुछ ऊंचे उठे हैं ?? साधक भाइयों बहनो! वास्तविकता तो यह है कि पुराणों ने काल्पनिक कहानियां गढ़ गढ़ के सत्यानाश कर दिया है सत्य सनातन धर्म का ? दुनिया के सबसे झूठे ग्रंथ यदि कोई है तो ये पुराण है । कभी किसी ऋषि के पास इन्होंने अप्सरा भेज दी और कभी किसी के पास किसी अन्य चमत्कार का वर्णन कर दिया । कभी किसी व्यक्ति की हजारों वर्ष उम्र बता दी और कभी किसी व्यक्ति को हजारों वर्ष तपस्या करता हुआ बता दिया। कभी ब्रह्मा जी को काम पीड़ा से ग्रस्त होकर अपनी ही पुत्री के पीछे दौड़ा दिया तो कभी हजारों वर्ष तपस्या करके लौटने के बाद हिरण्यकश्यप का परिवार वैसा का वैसा जीवित ही बता दिया। संसार के एकमात्र सत्य सनातन धर्म को इन पुराणों ने पाखंड का पुतला बनाकर छोड़ दिया। यहां पर विशेष चल रहा था कि साधक साधना में जब ऊंचा उठता है तो देवता उसके मार्ग पर अवरोध उत्पन्न करते हैं इस बात का सत्य इस प्रकार से समझिए।
👉 जब साधक की साधना उत्कृष्ट लेवल पर ऊपर बढ़ती है तो यह संपूर्ण प्रकृति उसका सहयोग करने लगती है और देवीय शक्तियां उसके ऊपर अनुग्रह करने लगती है । वह मानसिक स्तर पर जिस किसी भी विचार को अपनी इच्छा के रूप में धारण करता है ।उस विचार को पूरा करने के लिए दिव्य शक्तियां कार्य करने लगती है और बिना प्रयास के ही उसे वह वस्तु आसानी से प्राप्त हो जाती है। क्योंकि जब साधक की चेतना सहस्रार चक्र में स्थित होने लगती है तो यहां से निकले हुए विचार निश्चित रूप से अपना परिणाम उत्पन्न करके जाते हैं। साधक जिस प्रकार के भी विचारों को अपने मन में धारण करता है तो दिव्य शक्तियां उस अनुरूप परिणाम उत्पन्न करने लगती है। इससे यह होता है की इस संसार का वैभव भी उस साधक के पीछे दौड़ने लगता है। योगी साधक स्त्री हो या पुरुष उसके व्यक्तित्व में विशेष आकर्षण भी उत्पन्न हो जाता है ।इस वजह से पुरुष के प्रति स्त्रियां और स्त्रियों के प्रति पुरुष अत्यधिक मोहित होते हैं । ऐसी स्थिति में यदि साधक सावधान न रहें तो कहीं न कहीं वह किसी न किसी प्रकार से भटक कर साधना के जिस स्तर पर वह पहुंच गया है ।यदि किसी दूसरे लक्ष्य पर उसने मन को भटकाया तो निश्चित रूप से वह अपनी साधना से गिर जाएगा , भटक जाएगा ।उसका मन दूसरे लक्ष्य पर चला जाएगा। मन एक बार साधना के लक्ष्य को छोड़कर यदि किसी स्त्री में उलझ गया या किसी अन्य लक्ष्य में उलझ गया तो निश्चित रुप से साधना में उन्नति रुक जाएगी क्योंकि यह लक्ष्य स्वयं के द्वारा ही साधा जाएगा। कुंडलिनी जागरण से उर्जा का उधर्व गमन हो जाता है किंतु इसके बावजूद यह मन कभी भी किसी भी साधक को स्त्री के मोह पास में बांधने में समर्थ है । इस बात को कभी भी नहीं भूलना चाहिए ।यदि किसी भी सिद्ध योगी के नजदीक अत्यधिक सुंदर स्त्री मोहित करने पहुंचेगी तो वह उसके मन में विचलन अवश्य उत्पन्न कर देगी। इसलिए प्रत्येक साधक को इस राह पर चलते हुए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि ऊर्जा का उद्धर्व गमन होने के बाद भी मन को भटकने से रोकने के लिए विपरीत लिंग से कहीं न कहीं बचकर रहें ।सूक्ष्म रूप में अपने मन का निरीक्षण करते रहें। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित मान कर चलिए। जिस बात को कहा जाता है कि देवता परेशानी उत्पन्न करते हैं। वह परेशानी देवताओं के द्वारा नहीं है । इस समाज के द्वारा ही है क्योंकि यह समाज ऊपर उठ़ते हुए सूर्य को पूजता है ।यहां पर चमत्कार को नमस्कार है ,जहां पर चमत्कार है ,उसकी तरफ सारी दुनिया दौड़ती है । इसलिए साधक को इस दुनिया की दौड़ से निश्चित रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है वरना यह माया वापस घसीट कर अपने पंजे में जकड लेगी ।
- रामेश्वर हिंदू
🚩 सत्यमेव जयते🚩
🔥 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜
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