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Sunday, June 30, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र6

🕉🌞विज्ञान भैरव तंत्र 🌞🕉

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🌞👉 माता पार्वती ने जो कुछ पूछा ,उसके लिए भगवान शिव उनकी प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि हे प्रिय !परमानंद से प्राप्त होने वाली तृप्ति की  प्राप्ति में तत्पर एवं सबका कल्याण करने वाली हे देवी! ये तुमने बहुत अच्छे प्रश्न पूछे हैं। सब शास्त्रों की सार भूत यह बात अत्यंत गोपनीय है ।ऐसा होने पर भी इस गोपनीय रहस्य को मैं तुम्हें इसलिए बताता हूंँ कि तुम उस एकाकार पद में उत्सुकता के कारण इस रहस्य को जानने की योग्यता रखती हो।
🌞👉 भगवान शिव आगे कहते हैं -हे देवी! भैरव के साकार और निराकार ये दो रूप शास्त्रों में बताए गए हैं । इनमें साकार नाम से प्रसिद्ध यह जगत रूप अर्थ ,नील- पीत ,घट -पट आदि नाना विचित्र रूपों में दिखाई देता है। ये सब इंद्रजाल के समान ,माया से निर्मित और गंधर्व नगर के भ्रम के समान स्वप्न में देखी गई वस्तु के समान ,अस्थिर एवं असत्य स्वरुप हैं । इस प्रकार के असत्य स्वरुप में भ्रांत बुद्धि रखने वाले ,फल की आकांक्षा से नाना कर्मकांडों में रुचि रखने वाले मैं विष्णु की पूजा करता हूंँ ,मैं गणपति की पूजा करता हूंँ ।ये मुझे पुत्र ,धन आदि देंगे। इस तरह के भांति भांति के संकल्प विकल्पों के कारण अपने वास्तविक स्वरुप से अपरिचित व्यक्तियों के लिए ये साकार स्वरूप उपदिष्ट हैं ।इसका उपदेश इसलिए किया गया है कि निराकार स्वरूप में प्रवेश पाने के लिए साधक को पहले  साकार स्वरुप में ध्यान की योग्यता प्राप्त हो जाए । साकार स्वरूप में आस्था एवं विश्वास जागृत होने पर उस साधक को निराकार के वास्तविक सत्य दर्शन को समझाना अत्यंत आसान  हो जाता है क्योंकि जब तक साधक में आस्था एवं विश्वास जागृत नहीं होता उसे अध्यात्म मार्ग पर आगे ले जाना कठिन कार्य है।साकार स्वरूप का यह उपदेश तत्व के जिज्ञासुओं के लिए नहीं है अर्थात भगवान शिव के कहने का अर्थ यह है कि जिनकी बुद्धि अविकसित एवं अल्प होती हैं, उनके लिए ईश्वर के विभिन्न साकार स्वरूपों  की कल्पना की गई हैं, ताकि बाल बुद्धि के लोग उन रूपों में आस्था जागृत करके संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त उस सूक्ष्म चेतनामयी निराकार ब्रह्म से तादात्म्य स्थापित करने की योग्यता विकसित कर सकें किंतु जो ईश्वर के तत्व दर्शन को समझना चाहते हैं ,उनके लिए साकार स्वरूप का कोई विशेष महत्व नहीं है ।उन्हें सिर्फ और सिर्फ निराकार परमात्मा के ध्यान में तल्लीन रहना चाहिए क्योंकि निराकार स्वरूप ही उसका वास्तविक एवं सत्य स्वरूप है। निराकार के माध्यम से ही  भैरव के विराट स्वरुप का साक्षात्कार होता है। साकार सीमित है, निराकार विस्तृत है।
⚜👉 इस सिद्धांत के आधार पर भगवान शिव का कहना है कि विभिन्न साकार स्वरूप उस परमात्म तत्त्व को समझाने के लिए की गई कल्पनाएं हैं ;क्योंकि उस परमात्मा के वास्तविक स्वरुप को शब्दों में नहीं समझाया जा सकता । इसलिए उसे समझाने के लिए कल्पनाओं का सहारा लेना पड़ता है।
🌞👉 इस पर माता पार्वती पूछती है कि यदि यह सब स्वरूप कल्पना मात्र हैं तो फिर उन शास्त्रों में ऊपर बताए गए स्वरूपों का वर्णन क्यों किया गया है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान शिव कहते हैं--
👉  तीव्र शक्तिपात से जिनकी बुद्धि अच्छी तरह से पवित्र नहीं  होती हैं,ऐसे व्यक्तियों की बुद्धि परमात्मा की ओर उन्मुख हों इसलिए ऐसे लोगों को विभिन्न प्रकार के आकारों के माध्यम से   भैरव का भय दिखाकर भैरव के वास्तविक स्वरुप की ओर अग्रसर किया जाता है। जिस प्रकार बालक को मां गलत राह पर जाने से डर दिखाकर रोकती है ।वही कार्य इन साकार स्वरूपों के माध्यम से  विषयासक्ति की ओर अग्रसर लोगों को नियंत्रित करने में होता हैं। इन साकार स्वरूपों के माध्यम से अल्पबुद्धि व्यक्तियों को  भैरव परायण  करके उपासना- साधना में लगाया जाता है। जिससे कि वे धीरे-धीरे परभैरव अवस्था तक पहुंच कर उस भैरव स्वरूप के वास्तविक सत्य ज्ञान को अपने जीवन में धारण कर सकें।
                

          ⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
                🚩 जय गुरुदेव 🚩
         ⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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