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Thursday, May 9, 2019

शाक्त मत और अद्वैत का सिद्धांत !सत्य क्या है ?

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🌞 ⚜️शाक्त मत और अद्वैत का सिद्धांत ⚜️
               ⚜️🔱सत्य क्या है?🔱⚜️

                          -- महेश उपाध्याय

🌞 महेश जी जय मां आदिशक्ति ! इस देश एवं धर्म की विडंबना यही रही है, यहां पर कोई व्यक्ति चाहे कितना ही सत्य को सामने रखना चाहे, पाखंड वादी अपने हिसाब से उसकी कही हुई बातों का गलत अर्थ एवं गलत मंतव्य प्रस्तुत कर ही देते हैं । पुराणों में जिस प्रकार से तप करने का विधान बता रखा है ।वास्तविक अर्थ में मध्यकाल में साधना की शुरुआत करने वाले अधिकांश साधक शायद उसी प्रकार से भूखे  प्यासे रहकर ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयास करते थे। इसका नतीजा यह होता था कि वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त होकर मृत्यु के मुख के नजदीक चले जाते थे, क्योंकि साधना का वास्तविक सत्य ज्ञान देने वाले उस समय में सहजता से मिलना ही मुश्किल हो गए थे और आज भी स्थिति कुछ ऐसी ही है किंतु यह इंटरनेट का युग है ; यहां पर जिज्ञासु को सब कुछ मिल जाता है । मध्यकाल में सामाजिक भेदभाव एवं पाखंडवाद अत्यंत चरम सीमा पर पहुंच चुका था।  वैदिक सत्य ज्ञान विलुप्त हो चुका था और व्यवसायवादी पाखंड हर स्थान पर व्याप्त था। जो भी साधक साधना के क्षेत्र में उतरता था तो उसके हाथ में पुराण ही आते थे और पुराणों में तपस्या का जो विधान बता रखा है ।उस पर चलने के बाद व्यक्ति सत्य को जानना तो दूर मृत्यु के मुख में निश्चित रूप से चला जाएगा ,यह निश्चित है । भगवान आदि शंकराचार्य ने भी शरीर की शक्ति को नजरअंदाज करके तप करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे उनके संपूर्ण शरीर की शक्ति क्षीण हो गई । निश्चित ही मृत्यु के मुख के नजदीक पहुंचने वाले थे  किंतु मां आदिशक्ति जो सबकी जगत जननी है ,साधकों को कहीं ना कहीं से, वह बचा ही लेती है । जैसा कि कई बार मुझे भी बचाया है। डांटती भी है ,पीटती भी है किंतु अपने बच्चों से ममता बहुत रखती है, स्नेह बहुत करती है । आदि शंकराचार्य जी को ज्ञान दिया कि इस शरीर की शक्ति को क्षीण  करके तुम कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकोगे?  पहले शक्ति को समझो! शरीर में शक्ति धारण करो! शक्ति के साथ ही शिव को प्राप्त किया जा सकता है अर्थात्  मध्यम मार्ग पर चलते हुए ही वास्तविक सत्य ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है ; लक्ष्य साधा जा सकता है ।यही ज्ञान भगवान बुद्ध को हुआ था, साधना करते हुए । क्योंकि उन्होंने भी इसी प्रकार से अन्न जल त्याग कर साधना करने का प्रयास किया था, किंतु उससे वास्तविक सत्य सामने प्रकट नहीं हुआ। योग की सिद्धि संयमित दिनचर्या से होती है ।भूखे मरने से ईश्वर प्राप्त नहीं होता। हम सोचते हैं --9 दिन तक व्रत कर लिया शक्ति की उपासना हो गई किंतु यह शक्ति की उपासना का विधान नहीं है। बस वह मां कृपामयी है, इसलिए उसका आशीर्वाद तो प्रत्येक पुत्र के सिर पर हमेशा रहता है। किंतु प्रत्येक साधक को एक बात निश्चित रूप से समझ लेनी चाहिए ।इस शरीर में शक्ति को ध्यान रखते हुए, अनुशासित जीवन जीते हुए, साधना के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही शक्ति के वास्तविक सत्य एवं ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जान सकेगा ।यही भगवान शंकराचार्य ने उनकी सौंदर्य लहरी में अभिव्यक्त भी किया है। अद्वैत का सिद्धांत शक्ति के सिद्धांत से अलग नहीं है ।अद्वैत का सिद्धांत योग मार्ग का अनुसरण करने वालों का अंतिम सत्य है । अद्वैत भावना की पूर्ण सिद्धि ,बिना शक्ति को साथ लिए कोई कर ही नहीं सकता ,संभव ही नहीं है। जब तक वह अपनी मूल चेतना को सहस्रार चक्र में स्थित नहीं कर लेगा तब तक  कोई भी व्यक्ति अद्वैत का भाव  किसी भी प्रकार से जागृत नहीं कर सकता। इसलिए शाक्त मत और अद्वैत मत अलग अलग नहीं बल्कि पूर्णतया एक हैं। बिना कल्याणकारी बुद्धि के शक्ति सिर्फ विनाश का कारण है और बिना शक्ति के कल्याणकारी बुद्धि  तत्व किसी काम का नहीं। कल्याणकारी व्यक्तित्व और शक्ति से  संपन्न जीवन ,यही शिव और शक्ति का अपने जीवन में वास्तविक सामंजस्य है। शक्ति भी हो किंतु मानसिकता प्राणी मात्र एवं मानव मात्र के लिए कल्याणकारी हो। मूलत: शक्ति के तीन स्वरूप हैं सरस्वती, लक्ष्मी और काली। सरस्वती अर्थात ज्ञान  शक्ति ।लक्ष्मी अर्थात् धन की शक्ति । काली अर्थात् आत्म बल  की शक्ति। बाहुबल एवं संगठन के बल को भी आप काली के क्षेत्र में ही मानेंगे। जिस व्यक्ति के पास इन  तत्वों का जितना अधिक सामंजस्य है ,वह इस संसार में जीवन पथ पर उतना ही सहजता से आनंद के साथ आगे बढ़ पाता है। एक भी क्षेत्र कमजोर हुआ जीवन के लिए बाधा है, मुक्ति के मार्ग में बाधा है, शिव तक पहुंचने के क्षेत्र में बाधा है। जो सांसारिक व्यक्ति है, उसने यदि इन तीनों को नहीं साधा तो उसे समस्याओं से जूझना पड़ेगा। किसी कथा वाचक के शब्दों पर मत जाइए सिर्फ अपने व्यक्तिगत अनुभव से जानिए। क्या तीनों शक्तियों का सामंजस्य आवश्यक नहीं ? यदि आपने सरस्वती को अर्जित करके लक्ष्मी को एकत्रित कर लिया और काली पर ध्यान नहीं दिया तो कोई अनपढ़ गंवार तलवार लेकर आपके घर तक पहुंच जाएगा और फिर आपका ज्ञान एवं आपका धन शायद आपकी रक्षा न कर सके। इसलिए साधना का पथ हो या जीवन का पथ शक्ति का सामंजस्य  नितांत आवश्यक है और इसी सामंजस्य के साथ उस परम सत्ता से एकात्मकता स्थापित हो सकती है ।  

         🔱⚜️ सत्यमेव जयते ⚜️🔱

           ⚜️जय गुरुदेव  ⚜️                
    🔱🚩जय मां आदिशक्ति 🚩🔱

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