🕉🌞 जाबालदर्शनोपनिषद 🌞🕉
🌞 सप्तम खंड 🌞
🔥 प्रत्याहार 🔥
⚜️ इस खंड में योग के पांचवे अंग प्रत्याहार के विषय में समझाया गया है।
🌞👉 भगवान दत्तात्रेय कहते हैं- हे महामुने! अब मैं प्रत्याहार का वर्णन करता हूंँ --विषय वासनाओं में स्वभाव वश विचरण करने वाली समस्त इंद्रियों को बलात वहां से वापस लाने का जो प्रयत्न है, उसी को प्रत्याहार कहते हैं। मनुष्य जो कुछ भी देखता है ,वह सब ब्रह्म ही है,इस प्रकार समझते हुए ब्रह्म में चित्त को एकाग्र कर लेना ही प्रत्याहार है।
👉 वायु को एक जगह से खींच कर दूसरी जगह पर प्रतिष्ठित करें जैसे भ्रकुटी में ध्यान लगाकर विशुद्ध चक्र पर ले जाएं ,विशुद्ध चक्र से अनाहत चक्र में ध्यान ले जाएं ,अनाहत से मणिपुर चक्र में ध्यान ले जाएं ,मणिपुर से स्वाधिष्ठान चक्र में ध्यान ले जाएं, स्वाधिष्ठान से मूलाधार चक्र में ध्यान ले जाएं, इस प्रकार से ध्यान को बदल-बदल कर लगाने से जहां पर ध्यान लगाते हैं ,प्राण का प्रवाह भी उसी ओर चला जाता है।
👉 इस प्रकार प्रत्याहार की क्रिया में रत बुद्धिमान पुरुष के सभी पाप एवं जन्म मृत्यु रूप समस्त व्याधियां स्वयमेव नष्ट हो जाती है। (पाप नष्ट होने का अर्थ सिर्फ इतना है कि पाप करने की ओर जो हमारी प्रवृत्ति है वह नष्ट हो जाती है ।जब प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है तो आगे हम पाप मूलक कार्य नहीं करते । पिछले किए गए अच्छे एवं बुरे कर्मों का फल धीरे-धीरे जीवन में आता रहता है और समाप्त होता रहता है क्योंकि कर्म कभी भी समाप्त नहीं होता ,कर्म सिर्फ और सिर्फ परिणाम देकर जाता है । अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल यही नियति का विधान है इसलिए जब साधक की पाप कर्म प्रवृत्ति की निवृत्ति हो जाती है तो आगे पाप मूलक कर्म नहीं होते जिससे साधक मुक्त होने में समर्थ हो जाता है लेकिन किये गए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है ,वह नष्ट नहीं होता।) यदि कोई व्यक्ति आंख बंद करके ध्यान में बैठने को ही साधना समझता है तो वह संसार का सबसे बड़ा मूर्ख व्यक्ति है। आंख बंद करके बैठना तो मन और इंद्रियों को बुद्धि एवं विवेक के नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया मात्र है किंतु यदि ध्यान से उठने के बाद साधक ने अपनी बुद्धि एवं सद् विवेक का जीवन में प्रयोग नहीं किया तो ऐसा साधक साधना से विध्वंस एवं भटकाव के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त कर पाने में असमर्थ रहेगा। मन एवं इंद्रियों पर बुद्धि एवं विवेक का आधिपत्य हो जाना ही साधना करने का प्रथम ,अंतिम एवं शाश्वत उद्देश्य है और इसी से मुक्ति निश्चित होती है क्योंकि कितना ही बड़ा यति -तपस्वी हो यदि वह सोच विचार कर बुद्धि एवं विवेक के इस्तेमाल के बिना जीवन में कर्मों का आचरण करता है तो वह कभी भी अपने कर्मों के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि कर्म ही बंधन एवं मोक्ष का सेतु है। सत्कर्म आत्मा को आनंद देते हैं और बुरे कर्म आत्मा को पीड़ित एवं कुंठित करते हैं। जब तक पाप कर्म आत्मा पर बोझ बनकर पड़े हैं तब तक मुक्ति कहां ? और पाप कर्मों से निवृति सिर्फ और सिर्फ सद विवेक का उपयोग करने पर ही हो सकती है। सद् विवेक की उत्कृष्ट उपलब्धि को ही ऋतंभरा प्रज्ञा के नाम से जाना जाता है जो बुद्धि सिर्फ सत्य को धारण करती है वही ऋतंभरा प्रज्ञा है । जो सत्य एवं असत्य का निर्णय करने की पूर्ण सामर्थ्य रखती है वही ऋतंभरा प्रज्ञा है। यही योग साधना की परम उपलब्धि है जिससे साधक अच्छे एवं बुरे का सही रूप में निर्णय कर पाने की सामर्थ्य अर्जित करता है । वह मन के अधीन नहीं वह बुद्धि एवं विवेक से सोच समझकर कर्मों का संधान करता है।
🌞👉 ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि मन को एकाग्र करके शरीर से आत्म बुद्धि को अलग करके उसे खुद ही निर्द्वंद एवं निर्विकल्प स्वरूप में अपने अंतरात्मा में स्थित करें। वेदांत तत्व के ज्ञाता विद्वानों ने इसी को ही वास्तविक प्रत्याहार कहा है।
👏 साधक का निष्कर्ष- प्रत्याहार का अर्थ है- अत्यधिक काम, क्रोध, लोभ, मोह ,दंभ ,दुर्भाव द्वेष, पाखंड ,झूठ, अशुद्ध खानपान व दुर्व्यसनों में घिरे हुए मन को उधर से मोड़ कर सत्मार्ग गामी बनाना अर्थात बुरी आदतों को छोड़कर परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में मन को लगाना, सत्य न्याय एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को जागृत करना। ये सब सहजता से नहीं हो पाते किंतु जो व्यक्ति अपना आत्म निर्माण करना चाहते हैं ,वे कुछ ही महीनों के अभ्यास से अपनी प्रवृत्ति बदलती हुई स्वयं देख पाएंगे। इंसान स्वयं ही अपने आप का निर्माता है ।वह अपने व्यक्तित्व एवं वजूद को जैसा चाहे वैसा गढ़ सकता है। व्यक्तित्व के समुचित गठन के लिए मन एवं इंद्रियों को उन्मुक्त आचरण करने से रोक कर न्याय एवं सत्य युक्त आचरण की ओर अग्रसर करना ही प्रत्याहार कहा गया है।
-क्रमशः
⚜️🚩 एक पिता की चार संताने चारों का अलग वर्ण अलग-अलग गण हो सकता है । चारों की अलग-अलग प्रवृत्तियां हो सकती है ,गुण हो सकते हैं और वर्ण व्यवस्था का यह ज्ञान हमें ज्योतिष विज्ञान देता है। इसी विज्ञान के आधार पर विवाह आदि निश्चित होने पर समान प्रवृत्तियां के दंपतियों का जीवन सहजता से चल पाता है। वर्ण व्यवस्था कर्मों के प्रति सहज प्रवृत्ति को दिखाती है । यह हमारे ऋषियों के द्वारा दिया गया संपूर्ण विज्ञान है किंतु इस विज्ञान के स्थान पर जन्म के आधार पर जाति का निर्धारण करने का पाखंड पूर्ण घिनौना कृत्य यह पूर्ण विज्ञान सम्मत सनातन धर्म के साथ में घोर अपराध है। सनातन धर्म को पाखंडवाद से बाहर निकलना ही होगा और इसकी शुरुआत सबसे बड़े पाखंड जातिवाद को मिटाकर फिर से वर्ण व्यवस्था की स्थापना करनी ही होगी।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
(मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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