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Thursday, March 28, 2019

जाबालदर्शनोपनिषद 1

🕉🌞 जाबालदर्शनोपनिषद 🌞🕉
              ⚜️🚩⚜️
👉 यह उपनिषद् योगीराज भगवान दत्तात्रेय एवं उनके शिष्य सांड् कृति के संवाद के रुप में उद्धृत हुआ है।
🌞 मुनिश्रेष्ठ सॉन्ग कृति ने योगीराज दत्तात्रेय से पूछा- हे भगवन! अष्टांग योग का मेरे लिए सविस्तार वर्णन कीजिए, जिसे जानकर में जीवन मुक्त हो सकूं।
🌞 महायोगी दत्तात्रेय जी ने अपने शिष्य से कहा- है सॉन्ग कृते !मैं तुम्हारे लिए अष्टांग योग का  वर्णन करता हूंँ जो संसार का समस्त वैभव एवं मुक्ति देने वाला है। यम ,नियम, आसन, प्राणायाम ,प्रत्याहार, धारणा ,ध्यान तथा समाधी ही योग के आठ अंग हैं। इनमें यम के दस भेद बताए गए हैं- सत्य, अहिंसा ,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया क्षमा ,सरलता ,धृति मिताहार एवं बाह्य आभ्यंतर की पवित्रता।
🌞 अहिंसा -हे तपोधन !वेद में वर्णित विधि के अतिरिक्त मन वाणी एवं शरीर के द्वारा यदि किसी को किसी भी तरह से पीड़ित किया जाता है अथवा उसके प्राणों को शरीर से अलग कर दिया जाता है तो वही वास्तविक हिंसा कही गई है।इससे भिन्न और कोई हिंसा नहीं है। हे मुने ! यह भाव रखना चाहिए कि आत्मतत्व सर्वत्र व्याप्त है ! शस्त्र आदि के द्वारा वह नष्ट नहीं हो सकता। निरंकुश अत्याचारियों का वध अहिंसा ही मानी जाती है।
🌞 सत्य - हे मुने!चक्षु आदि इंद्रियों के माध्यम से जो जिस रूप में देखा, सुना और समझा हुआ विषय है। उसको उसी रुप में वाक् इंद्रिय के द्वारा कहना ही सत्य है।इस संसार में जो कुछ भी है ,वह उस परम पिता परब्रह्म का रचा हुआ है इसलिए सब कुछ सत्य स्वरूप है।उस सत्य स्वरूप का ही अंश है। इस तरह का जो दृढ़ निश्चय है उसी को वेदांत ज्ञान के विशेषज्ञों ने सर्वश्रेष्ठ सत्य बताया है।
🌞 अस्तेय- दूसरे व्यक्ति के रत्न आभूषण स्वर्ण अथवा मणि मुक्तक आदि से लेकर त्रण आदि के लिए मन में भी कभी प्राप्त करने की इच्छा न करना अर्थात दूसरों की बड़ी अथवा छोटी वस्तुओं के लिए मन में कभी लोभ लालच न लाना ही अस्तेय है। इस संसार के समस्त पदार्थों में अनासक्त भाव  बुद्धि रखकर आत्मा से दूर रखने का जो भाव है उसी को आत्मज्ञानी जनों ने अस्तेय कहा है।

🌞 ब्रह्मचर्य- मन वचन एवं कर्म से पर स्त्रियों के सहवास का त्याग एवं ऋतु काल या अपनी अर्धांगिनी की भावेच्छा के अनुसार कम से कम  संभोग करना तथा काम ,क्रोध लोभ, मोह आदि विकारों को नियंत्रित रखते हुए परब्रह्म परमात्मा में मन को लगाए रखना ही ब्रह्मचर्य है।
🌞 दया- समस्त प्राणियों को अपनी ही भांति जानकर उनके प्रति मन वचन एवं शरीर द्वारा आत्मीयता का अनुभव करना अर्थात अपनी ही तरह उनके दुखों को दूर करने तथा अधिक से अधिक सुख पहुंचाने का प्रयास करना ही दया है।
🌞 आर्जव ( सरलता )-पुत्र मित्र स्त्री रिपु एवं स्व आत्मा में भी सदैव मन का समान भाव रखना ही सरलता है।
👉 अंदर से समदर्शी होना और बाहर से दुष्टों के प्रति कठोर होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यही सत्य धर्म का लक्षण है। महाराज जनक ऐसे ही व्यक्तित्व थे।
🌞 क्षमा- अपने पास दंड देने की शक्ति होने पर भी शत्रुओं द्वारा मन वचन एवं शरीर से कष्ट दिए जाने पर भी बुद्धि में थोड़ा भी क्रोध न आने देना ही क्षमा कहलाता है।
👉 क्षमा शक्तिशाली को ही शोभा देती है। कमजोर की क्षमा को कायरता ही समझा जाता है।
🌞 धृति- वेद ज्ञान से ही संपूर्ण जगत मोक्ष को प्राप्त होता है और अन्य किन्ही भी कारणों से नहीं। ऐसा जो दृढ़ संकल्प है, उसी को ही वेदज् पुरुषों ने धृति की उपाधि प्रदान की है अर्थात मैं आत्मा हूंँ, आत्मा से पृथक दूसरा और कुछ भी नहीं हूंँ। ऐसी उत्तम बुद्धि रखना ही धृति है ।
🌞 मिताहार- अल्प मात्रा में शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करना, पेट के दो भाग भोजन से, तृतीय भाग को जल से तथा चौथे भाग को वायु के लिए खाली छोड़ना ही योग मार्ग के अनुकूल भोजन है, यही मिताहार कहलाता है।
🌞 शौच- अपने शरीर को बाहर से जल आदि द्वारा स्नान करके पवित्र रखना एवं मन के द्वारा पवित्र भावों का चिंतन मनन करना ही शौच कहलाता है । जो साधक ज्ञान रूपी पवित्रता को भूलाकर केवल बाहरी पवित्रता में ही रमा रहता है, वह स्वर्ण का त्याग करके मिट्टी के ढ़ेरों का संग्रह करने वाले मूर्ख की ही भांति है ।

साधक के दो शब्द 👉 ये 10 यम हैं ।
इन्हें पढ़ कर आप यह न समझें कि हम तो योग मार्ग पर चल ही नहीं सकते! आप जहां हैं ,जैसे हैं, उसी स्वरूप में योग मार्ग पर चल सकते हैं । आप ज्यों ही आसन ,प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास करेंगे। आपके अंदर से स्वत:ही बदलाव होता चला जाएगा। यदि आप यह सोचते हैं की संपूर्ण यम-नियम का पालन करने वाला ही योगी बन सकता है तो फिर संसार में कोई योग कर ही नहीं सकता। हांँ योग करते करते वह यम और नियम का पक्का हो जाता है क्योंकि योग उसके शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन कर देता है। जो रोगी होगा वह बीमारी को ठीक करने के लिए दवाई लेगा ।यदि बीमारी ही नहीं है तो दवाई लेने की आवश्यकता कहाँ । हमारे मन मस्तिष्क में अति काम ,क्रोध ,लोभ ,दंभ ,दुर्भाव , द्वेष, पाखंड , झूठ आदि विकार मुक्ति के मार्ग में अवरोधक घातक बीमारियां हैं ।इनसे मुक्त होने के लिए अष्टांग योग  रुपी औषधि का सेवन प्रत्येक साधक को करना चाहिए। अब यहां पर यह जरूर है कि किस रोगी को कौन सी दवा देनी है ।यह अनुभवी योग्य सिद्ध गुरु ही स्पष्ट रूप से समझा सकता है ।

                      --सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव                             (मेरी संपूर्ण पहचान) 

                                -- क्रमशः
            ⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
      
              ⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
            ⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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